युद्ध का असर: बरेली में 5 फैक्टरियां बंद, उत्पादन 40% घटा
पश्चिम एशिया युद्ध का असर बरेली के उद्योगों पर दिखने लगा है। PNG कीमतों में वृद्धि, LPG किल्लत और श्रमिकों की कमी से उत्पादन 40% घटा, कई फैक्टरियां बंद।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब बरेली के औद्योगिक ढांचे पर साफ दिखाई देने लगा है। ऊर्जा संसाधनों की बढ़ती कीमत, एलपीजी की कमी और कच्चे माल की सीमित उपलब्धता के चलते शहर की कई इकाइयों का संचालन प्रभावित हो रहा है। हालात ऐसे हैं कि औद्योगिक उत्पादन में करीब 40 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है, जबकि कुछ फैक्टरियां पूरी तरह बंद हो चुकी हैं।
उद्यमियों के अनुसार, औद्योगिक और व्यावसायिक पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की कीमतों में पिछले तीन सप्ताह के भीतर लगातार तीन बार बढ़ोतरी हुई है। प्रति स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (SCM) कीमत 58 रुपये से बढ़कर पहले 66, फिर 75 और अब 80 रुपये तक पहुंच गई है। लगातार बढ़ती लागत और सीमित संसाधनों के कारण उद्योगों के लिए संचालन बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।
उद्योग जगत का कहना है कि मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। यदि जल्द राहत नहीं मिली, तो उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी करना मजबूरी हो जाएगा, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।
इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन, बरेली चैप्टर के चेयरमैन मयूर धीरवानी के मुताबिक, फिलहाल कारोबारी मुनाफा कम करके काम चला रहे हैं, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती। उन्होंने संकेत दिए कि यदि हालात सामान्य नहीं हुए, तो विशेष रूप से खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों की कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
इधर, एलपीजी की कमी के चलते श्रमिकों का पलायन भी एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। पसाखेड़ा, फरीदपुर और भोजीपुरा औद्योगिक क्षेत्रों से करीब 20 प्रतिशत मजदूर अपने गांव लौट चुके हैं। जो श्रमिक अभी मौजूद हैं, वे भी गेहूं कटाई या स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देकर अवकाश ले रहे हैं। इससे कुशल मानव संसाधन की कमी हो रही है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गत्ता निर्माण से जुड़ी यूनिपैक, खाद्य प्रसंस्करण इकाई आरएस फूड, जैविक उत्पाद बनाने वाली जय ऑर्गेनिक्स, प्लाईवुड फैक्टरी और रेनबो क्रिएटिव प्रिंटिंग प्रेस जैसी पांच फैक्टरियां पूरी तरह बंद हो चुकी हैं। इसके अलावा, कई अन्य इकाइयों ने उत्पादन घटा दिया है और रात की शिफ्ट बंद कर दी है।
उद्योगों से जुड़े सहायक व्यवसाय भी प्रभावित हो रहे हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में ठहरने और भोजन की सुविधा देने वाले करीब 75 होटलों में से 30 ने सेवाएं बंद कर दी हैं। वहीं ढाबा संचालक गैस की कमी के चलते पारंपरिक तरीकों जैसे अंगीठी और चूल्हे पर खाना बनाने को मजबूर हैं।
फरीदपुर औद्योगिक एसोसिएशन के सचिव रजत मेहरोत्रा के अनुसार, कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की आपूर्ति को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। यदि किसी इकाई के पास 10 सिलेंडर का कनेक्शन है, तो उसे केवल 20 प्रतिशत यानी दो सिलेंडर ही मिल पा रहे हैं, जो उत्पादन के लिए नाकाफी है। इसके अलावा कच्चे माल की कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई है, जैसे पन्नी की कीमत प्रति किलो 100 रुपये तक बढ़ चुकी है।
कुल मिलाकर, ऊर्जा संकट, श्रमिकों की कमी और कच्चे माल की अनुपलब्धता ने बरेली के औद्योगिक परिदृश्य को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। यदि जल्द ही समाधान नहीं निकाला गया, तो इसका असर न केवल उद्योगों बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी देखने को मिलेगा।
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