बरेली स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट फेल? 200 करोड़ की परियोजनाएं बंद पड़ीं

बरेली में स्मार्ट सिटी मिशन के तहत करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई परियोजनाएं अब उपयोग के अभाव में धूल फांक रही हैं। करीब 200 करोड़ रुपये की लागत से बने कई बड़े प्रोजेक्ट जैसे अर्बन हाट, स्काई वॉक, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और मल्टीलेवल पार्किंग अब तक आम जनता के लिए पूरी तरह शुरू नहीं हो सके हैं, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अर्बन हाट बना अधूरा सपना
नगर निगम द्वारा शहर के प्रमुख स्थान पर बनाए गए अर्बन हाट का निर्माण दिसंबर 2025 में पूरा कर लिया गया था। इसे एक निजी एजेंसी को सौंपा गया, जो हर साल करीब 6.30 करोड़ रुपये का किराया भी दे रही है। इसके बावजूद, करीब 1.74 अरब रुपये की लागत से तैयार इस प्रोजेक्ट में ज्यादातर दुकानें बंद पड़ी हैं। केवल सामने के कुछ हिस्सों का सीमित व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, जबकि हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का उद्देश्य अधूरा रह गया है।
स्काई वॉक और पार्किंग भी बेकार
पटेल चौक पर बनाया गया स्काई वॉक और मल्टीलेवल पार्किंग जैसी परियोजनाएं भी उपयोग के इंतजार में हैं। इनका निर्माण पूरा होने के बावजूद आम लोगों के लिए इन सुविधाओं को शुरू नहीं किया गया है। इससे न केवल सरकारी धन का सही उपयोग नहीं हो पा रहा, बल्कि शहर की यातायात और सुविधाओं को बेहतर बनाने का उद्देश्य भी प्रभावित हो रहा है।
व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बना ‘खाली ढांचा’
जंक्शन रोड पर पुराने तांगा स्टैंड की जगह करीब 5 करोड़ रुपये की लागत से व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाया गया था। निर्माण पूरा हुए दो साल बीत चुके हैं, लेकिन ऊंचे किराये के कारण व्यापारी इसमें दुकान लेने से पीछे हट रहे हैं। नतीजतन यह कॉम्प्लेक्स अब तक खाली पड़ा हुआ है।
अन्य परियोजनाओं का भी बुरा हाल
स्मार्ट सिटी के तहत बनाए गए कई अन्य प्रोजेक्ट भी बदहाल स्थिति में हैं। डूडा कार्यालय परिसर में बना शौचालय बंद पड़ा है। गांधी उद्यान के पास बने शौचालयों की हालत खराब है, बेसिन टूटे हुए हैं और आसपास बिजली के तार लटक रहे हैं। वहीं अक्षर विहार में 34.34 लाख रुपये की लागत से तैयार सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट आज तक चालू नहीं हो सका है।
योजना बनाम जमीनी हकीकत
स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य शहरों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना और नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना था। लेकिन बरेली में यह योजना कागजों तक सीमित नजर आ रही है। निर्माण कार्य पूरे होने के बावजूद संचालन और प्रबंधन में कमी के कारण करोड़ों रुपये की परियोजनाएं बेकार साबित हो रही हैं।
उठ रहे बड़े सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब परियोजनाओं का निर्माण पूरा हो चुका है, तो उन्हें शुरू करने में देरी क्यों हो रही है? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर योजना बनाने में ही खामियां थीं?
जब शहर को ‘स्मार्ट’ बनाने का दावा किया जा रहा है, तब इन बंद पड़ी परियोजनाओं ने विकास मॉडल की वास्तविकता उजागर कर दी है। यदि समय रहते इनका संचालन शुरू नहीं किया गया, तो यह निवेश पूरी तरह व्यर्थ साबित हो सकता है।






