23 महीने बाद खुला करोड़ों की सरकारी जमीन के भू-घोटाले का राज
फोटोकॉपी के सहारे बदला गया सरकारी जमीन का रिकॉर्ड, तहसील प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल

23 महीने बाद खुला करोड़ों की सरकारी जमीन के भू-घोटाले का राज
फोटोकॉपी के सहारे बदला गया सरकारी जमीन का रिकॉर्ड, तहसील प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
रिपोर्ट : देवेंद्र पटेल
बरेली/नवाबगंज। नवाबगंज तहसील के ग्राम ज्योरा मकरंदपुर में सामने आए करोड़ों रुपये के भू-घोटाले ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में खुलासा हुआ है कि सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द करने के लिए नियमों को दरकिनार कर फाइलों में मूल दस्तावेजों की जगह फोटोकॉपी के आधार पर पूरी राजस्व प्रक्रिया पूरी कर दी गई। आरोप है कि तहसील प्रशासन के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से सरकारी भूमि को भूमाफियाओं के पक्ष में दर्ज करा दिया गया।
मामले की जड़ वर्ष 2013 में किए गए पट्टों से जुड़ी बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार तकनीकी खामियों के चलते ये पट्टे काफी पहले ही निरस्त हो चुके थे, लेकिन इसके बावजूद राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर जमीन को सरकारी खाते में दर्ज करने के बजाय निजी पक्षों के नाम बनाए रखा गया। शिकायतकर्ताओं द्वारा लगातार शिकायतें किए जाने के बाद जिलाधिकारी के निर्देश पर जब मामले की जांच शुरू हुई तो पूरे खेल का पर्दाफाश हो गया।
फोटोकॉपी के दम पर बदल दिया जमीन का भूगोल
जांच में सामने आया कि धारा 38 के तहत की गई प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं बरती गईं। आरोप है कि कानूनगो श्याम सुंदर गुप्ता ने बिना लेखपाल की अनिवार्य आख्या लिए ही फाइल को आगे बढ़ा दिया। वहीं तत्कालीन तहसीलदार दुष्यंत प्रताप सिंह ने भी मूल दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना ही प्रकरण को एसडीएम न्यायिक की अदालत में भेज दिया। इसी कथित कूटरचित प्रक्रिया के जरिए सरकारी भूमि को निजी पक्ष के नाम दर्ज करा दिया गया।
राजस्व नियमों के अनुसार किसी भी भूमि संबंधी कार्रवाई में मूल अभिलेखों का सत्यापन आवश्यक होता है, लेकिन इस मामले में फोटोकॉपी के आधार पर कार्रवाई किए जाने से पूरे सिस्टम की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है।
कब्जेदारों को स्टे दिलाने के लिए कार्रवाई में ढील के आरोप
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जब मामला सार्वजनिक होने लगा तब भी तहसील प्रशासन ने जानबूझकर कार्रवाई में सुस्ती बरती। हाल ही में शिकायत पर नायब तहसीलदार और पुलिस बल मौके पर पहुंचे, लेकिन कार्रवाई केवल औपचारिकता तक सीमित रही। आरोप है कि कब्जे वाली जमीन पर खड़ी गन्ने की फसल को हटाने तक का प्रयास नहीं किया गया और कब्जेदारों को मौखिक रूप से समय दे दिया गया।
इसी दौरान कब्जेदार तत्काल अपर आयुक्त (न्याय) की अदालत पहुंचे और स्टे ऑर्डर हासिल कर लिया। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया कब्जेदारों को राहत पहुंचाने के लिए सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी।
23 महीने तक लड़ते रहे ग्रामीण, तब खुला फर्जीवाड़ा
इस पूरे भू-घोटाले को उजागर करने में गांव के दो जागरूक ग्रामीण सूरजपाल और लालाराम की अहम भूमिका रही। दोनों ने करीब 23 माह पहले तहसील दिवस में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे की लिखित शिकायत दर्ज कराई थी।
आरोप है कि उस समय प्रशासन ने कार्रवाई करने के बजाय शिकायतकर्ताओं के नाम से ही विपक्षी पक्ष पर मुकदमा दर्ज कर मामले को दबाने का प्रयास किया। इसके बावजूद ग्रामीण लगातार संघर्ष करते रहे और उच्च अधिकारियों तक मामला पहुंचाते रहे। अंततः जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद जांच शुरू हुई और करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन से जुड़े इस बड़े फर्जीवाड़े की परतें खुलनी शुरू हो गईं।
जिलाधिकारी की कार्रवाई से मचा हड़कंप
मामले में लापरवाही और अनियमितता सामने आने के बाद जिलाधिकारी द्वारा संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। तहसीलदार को हटाए जाने और कानूनगो व लेखपाल के निलंबन के बाद राजस्व विभाग में हड़कंप की स्थिति बनी हुई है। वहीं ग्रामीण अब पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर भूमाफियाओं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।






