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बरेली

बरेली दंगा केस: फाईक इन्क्लेव जांच रिपोर्ट पर सवाल, कार्रवाई में देरी क्यों?

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बरेली में हुए दंगे के छह महीने बाद भी फाईक इन्क्लेव को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई में देरी सवालों के घेरे में है। दंगों के मुख्य आरोपी मौलाना तौकीर के जेल में होने के बावजूद उसकी शरणस्थली मानी जा रही इस कॉलोनी पर अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हो पाई है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के बीच यह मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।


जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं

फाईक इन्क्लेव में कथित अवैध कब्जों, सीलिंग भूमि, चकरोड और नहर की जमीन पर निर्माण को लेकर गठित जांच समिति की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। शहरवासियों का कहना है कि यदि जांच पूरी हो चुकी है तो रिपोर्ट को सामने लाना चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

दावे किए जा रहे हैं कि कॉलोनी में कई निर्माण नियमों को दरकिनार कर खड़े किए गए हैं, लेकिन इस संबंध में प्रशासन की ओर से कोई ठोस जानकारी साझा नहीं की गई है।


दंगे के बाद भी कार्रवाई अधूरी

26 सितंबर 2025 को बरेली में भड़के दंगों के दौरान शहर की कानून-व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इस मामले में मुख्य आरोपी मौलाना तौकीर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, लेकिन जिस फाईक इन्क्लेव में वह छिपा था, वहां बुलडोजर कार्रवाई अब तक नहीं हो सकी।

स्थानीय लोगों का मानना है कि दंगाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के संदेश को मजबूत करने के लिए इस स्थान पर भी ठोस कदम उठाए जाने चाहिए थे।


पुराने मामलों से भी जुड़ा रहा नाम

फाईक इन्क्लेव का नाम इससे पहले भी कई विवादों में सामने आता रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अतीक अहमद के भाई अशरफ और उसके करीबी सहयोगियों ने भी यहां शरण ली थी। इसके अलावा अवैध गतिविधियों और नशीले पदार्थों के कारोबार से जुड़े मामलों में भी इस क्षेत्र का नाम जुड़ता रहा है।


पूर्व जांचों पर भी उठे सवाल

बताया जाता है कि वर्ष 2023-24 में तत्कालीन मंडलायुक्त की जांच में भी इस क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर कब्जे और अवैध कॉलोनी विकसित करने के तथ्य सामने आए थे। कुछ मामलों में मुकदमे दर्ज हुए और गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की सिफारिश भी की गई थी, लेकिन आगे की कार्रवाई ठप पड़ गई।


जनता में असंतोष, कार्रवाई की मांग तेज

शहर में यह मुद्दा अब चर्चा का विषय बन चुका है। लोगों का कहना है कि यदि सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर काम कर रही है, तो इस मामले में भी पारदर्शिता और सख्ती दिखनी चाहिए।


निष्कर्ष

फाईक इन्क्लेव को लेकर लंबित जांच और कार्रवाई की धीमी रफ्तार प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रही है। अब देखना होगा कि शासन स्तर पर इस मामले में कब तक स्पष्ट निर्णय लिया जाता है और क्या कार्रवाई होती है।

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