बरेली राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम: 78 साल में सिर्फ 3 जीत, 2009 के बाद प्रतिनिधित्व खत्म

बरेली: देश की आजादी के 78 वर्षों बाद भी बरेली की सियासत में महिलाओं की भागीदारी सीमित ही बनी हुई है। महिला आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है, लेकिन स्थानीय चुनावी आंकड़े यह दर्शाते हैं कि प्रमुख राजनीतिक दल अब भी महिला उम्मीदवारों को पर्याप्त अवसर देने से बचते नजर आते हैं। यही कारण है कि जिले से अब तक संसद और विधानसभा तक केवल तीन महिलाएं ही पहुंच सकी हैं।
🔍 संसद तक पहुंची गिनी-चुनी महिलाएं
बरेली लोकसभा सीट से बेगम आबिदा अहमद पहली महिला सांसद बनीं, जिन्होंने 1981 और 1984 में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। इसके बाद आंवला लोकसभा सीट से मेनका गांधी ने जीत हासिल कर जिले का प्रतिनिधित्व किया।
विधानसभा स्तर पर ठाकुर सुमनलता सिंह ही एकमात्र महिला विधायक रहीं, जिन्होंने सन्हा (वर्तमान बिथरी) सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीता।
📉 2009 के बाद महिला प्रतिनिधित्व शून्य
बरेली जिले में दो लोकसभा और नौ विधानसभा सीटें होने के बावजूद 2009 के बाद से किसी भी सीट पर महिला जनप्रतिनिधि नहीं चुनी गई है। आखिरी बार मेनका गांधी ने आंवला सीट से जीत दर्ज की थी। 2014 के बाद से महिला प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त हो गया।
2014 के चुनाव में सपा की आयशा इस्लाम मैदान में उतरीं, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता संतोष गंगवार से पराजित हो गईं। इसके बाद प्रमुख दलों ने महिला उम्मीदवारों को सीमित ही अवसर दिए।
🏛️ विधानसभा में भी वही स्थिति
विधानसभा चुनावों में भी स्थिति लगभग समान रही है। ठाकुर सुमनलता सिंह के बाद कोई महिला विधायक नहीं बन सकी। वर्ष 2002 में वह मामूली अंतर से चुनाव हार गईं, जिसके बाद से महिला प्रतिनिधित्व लगातार शून्य बना हुआ है।
पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन ने भी बरेली कैंट सीट से कई बार चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सकीं। अन्य सीटों पर भी महिला उम्मीदवारों को मौका मिला, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।
👥 राजनीतिक परिवारों तक सीमित अवसर
विश्लेषण यह संकेत देता है कि महिलाओं को टिकट देने की प्रक्रिया आम महिलाओं तक नहीं पहुंच पाई है। अधिकतर अवसर राजनीतिक परिवारों से जुड़ी महिलाओं को ही दिए जाते हैं, जिससे जमीनी स्तर पर नए महिला नेतृत्व का विकास बाधित होता है।
🏡 जिला पंचायत में दिखती है नारीशक्ति
जहां लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी कम है, वहीं जिला पंचायत स्तर पर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है। अब तक चार महिलाएं अध्यक्ष पद संभाल चुकी हैं—
- सरोज यादव (1995)
- ऊषा गंगवार (2000)
- नीरू पटेल (2011)
- रश्मि पटेल (2021 से वर्तमान)
यह उदाहरण दर्शाते हैं कि अवसर मिलने पर महिलाएं प्रभावी नेतृत्व देने में सक्षम हैं।
⚖️ आरक्षण से उम्मीद, लेकिन असर का इंतजार
महिला आरक्षण को लेकर उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन इसका प्रभाव अभी जमीनी स्तर पर नजर नहीं आ रहा। बरेली की राजनीति में आधी आबादी को बराबरी का अवसर कब मिलेगा, यह अब भी एक महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है।






