Bareilly News: सरकारी गनर बने रुतबे का सिंबल, नेताओं में बढ़ी ‘भौकाल’ की होड़

Bareilly News: सरकारी गनर बने रुतबे का सिंबल, नेताओं में बढ़ी ‘भौकाल’ की होड़
सुरक्षा या स्टेटस सिंबल?
बरेली में सरकारी गनर अब सिर्फ सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि नेताओं और रसूखदारों की प्रतिष्ठा का प्रतीक बनते जा रहे हैं। जिले में कई नेता निजी खर्च पर सरकारी गनर लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव दिखाने में जुटे हैं। इस व्यवस्था पर हर महीने लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, जबकि गैर जरूरी सुरक्षा पर सवाल भी खड़े होने लगे हैं।
46 नेताओं की सुरक्षा में 55 गनर तैनात
जनपद में वर्तमान समय में 46 राजनीतिक व्यक्तियों की सुरक्षा में कुल 55 सरकारी गनर लगाए गए हैं। इनमें सांसद, विधायक, पूर्व विधायक, आयोग सदस्य और कई चर्चित नेता शामिल हैं। कई नेताओं को सरकारी खर्च पर सुरक्षा मिली हुई है, जबकि कुछ नेता प्रतिशत व्यय के आधार पर गनर लेकर चलते हैं।
चुनाव नजदीक, गनर की मांग तेज
सूत्रों के मुताबिक आगामी विधानसभा और निकाय चुनाव को देखते हुए कई छोटे नेता भी सरकारी गनर लेकर माहौल बनाने में लगे हैं। जान का खतरा बताकर लगातार नए आवेदन दिए जा रहे हैं। हालांकि जिला और मंडल स्तरीय सुरक्षा समितियों ने जांच के बाद सौ से अधिक आवेदन खारिज भी कर दिए हैं।
लाखों रुपये का खर्च
सरकारी गनर की तैनाती पर सरकार का बड़ा खर्च आता है। एक गनर पर लगभग 1.37 लाख रुपये प्रतिमाह खर्च निर्धारित है।
– 100 फीसदी व्यय पर पूरी रकम जमा करनी होती है
– 50 फीसदी व्यय पर आधी रकम जमा करनी पड़ती है
– 10 फीसदी व्यय पर करीब 13,737 रुपये मासिक जमा करने होते हैं
क्यारा ब्लॉक प्रमुख के पति अरविंद चौहान सौ फीसदी व्यय पर गनर लिए हुए हैं, जबकि भाजपा नेता अनिल शर्मा, सुरेश गंगवार और शेरगढ़ ब्लॉक प्रमुख भूपेंद्र कुमार 50 फीसदी व्यय जमा कर रहे हैं।
ऐसे मिलती है सरकारी सुरक्षा
जिला स्तरीय समिति जिसमें डीएम, एसएसपी और सीओ एलआईयू शामिल होते हैं, किसी व्यक्ति को अधिकतम तीन महीने तक सुरक्षा उपलब्ध करा सकती है। वहीं मंडल स्तरीय समिति अधिकतम नौ महीने तक सुरक्षा बढ़ा सकती है। इसके बाद सुरक्षा जारी रखने का निर्णय शासन स्तर पर लिया जाता है।
एसएसपी ने क्या कहा?
एसएसपी अनुराग आर्य के मुताबिक किसी भी नेता या वीआईपी को सुरक्षा देने से पहले खतरे का आकलन किया जाता है। सुरक्षा की जरूरत और खतरे के आधार पर गनर व्यय का प्रतिशत तय किया जाता है। हाल ही में कई गैर जरूरी गनर वापस भी बुलाए गए हैं और कई नए आवेदन निरस्त किए गए हैं।
बड़ा सवाल
जब सरकारी संसाधनों पर लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सभी लोगों को वास्तव में सुरक्षा की जरूरत है, या फिर सरकारी गनर अब सिर्फ राजनीतिक प्रभाव और रुतबे का प्रतीक बन चुके हैं?






