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हाई कोर्ट के आदेश के बाद यूपी में बड़ा बदलाव

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हाई कोर्ट के आदेश के बाद यूपी में बड़ा बदलाव
29 अधिनियमों में अब पुलिस सीधे दर्ज नहीं कर सकेगी मुकदमा
दहेज, घरेलू हिंसा, चेक बाउंस समेत कई मामलों में पहले कोर्ट या सक्षम विभाग की अनुमति होगी जरूरी

रिपोर्ट : देवेंद्र पटेल
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नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर बड़ा बदलाव किया गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद डीजीपी मुख्यालय ने प्रदेश के सभी जिलों की पुलिस को नए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। अब करीब 29 अधिनियमों और विशेष कानूनों से जुड़े मामलों में पुलिस सीधे मुकदमा दर्ज नहीं कर सकेगी। इन मामलों में पहले संबंधित विभाग, सक्षम अधिकारी, आयोग, बोर्ड या न्यायालय की शिकायत अथवा अनुमति आवश्यक होगी।
डीजीपी राजीव कृष्ण की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि जिन अधिनियमों में सीधे एफआईआर दर्ज करने का प्रावधान नहीं है, वहां थाना पुलिस पहले शिकायतकर्ता को संबंधित विभाग या न्यायालय के पास भेजेगी। सक्षम प्राधिकारी की संस्तुति, परिवाद या आदेश मिलने के बाद ही पुलिस आगे की कार्रवाई करेगी।
हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद हरकत में पुलिस मुख्यालय
दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी कि कई मामलों में पुलिस कानून के विपरीत सीधे एफआईआर दर्ज कर रही है, जबकि संबंधित अधिनियमों में पहले परिवाद दाखिल करने या विभागीय शिकायत का प्रावधान है। अदालत ने इसे गंभीर कानूनी त्रुटि मानते हुए प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने की बात कही थी। इसके बाद डीजीपी मुख्यालय ने प्रदेशभर की पुलिस को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए।
इन मामलों में सीधे FIR नहीं लिख सकेगी पुलिस
नए निर्देशों के अनुसार निम्न अधिनियमों और विशेष मामलों में सीधे मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा—
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (चेक बाउंस मामले)
खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957
कॉपीराइट अधिनियम
फैक्ट्री अधिनियम
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम
मोटर वाहन अधिनियम की कुछ धाराएं
श्रम कानूनों से जुड़े प्रकरण
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेष मामले
राजस्व एवं प्रशासनिक अधिनियमों के कुछ विवाद
भारतीय न्याय संहिता की विशेष श्रेणियां
इन मामलों में संबंधित विभाग, निरीक्षक, अधिकृत अधिकारी या सक्षम न्यायालय की शिकायत मिलने के बाद ही पुलिस कार्रवाई कर सकेगी।
थाना प्रभारियों और विवेचकों को सख्त निर्देश
डीजीपी कार्यालय ने सभी एसएसपी, एसपी, सीओ और थाना प्रभारियों को निर्देश दिए हैं कि एफआईआर दर्ज करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि संबंधित कानून पुलिस को सीधे मुकदमा दर्ज करने की अनुमति देता है या नहीं। यदि कानून में परिवाद या विभागीय अनुमति की बाध्यता है, तो उसी प्रक्रिया का पालन कराया जाए।
सूत्रों के मुताबिक, पुलिस मुख्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि नियमों के विपरीत दर्ज मुकदमे अदालत में टिक नहीं पाते और इससे अभियोजन कमजोर हो जाता है। कई मामलों में आरोपी तकनीकी आधार पर राहत भी हासिल कर लेते हैं।
आम जनता पर क्या पड़ेगा असर?
कानूनी जानकारों का कहना है कि इस व्यवस्था से फर्जी और गैर जरूरी मुकदमों में कमी आ सकती है। वहीं पुलिस अब गंभीर अपराधों पर ज्यादा फोकस कर सकेगी। हालांकि आम लोगों को अब कुछ मामलों में सीधे थाने जाने के बजाय पहले संबंधित विभाग, कोर्ट या अधिकृत अधिकारी के पास जाना पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था कानूनी प्रक्रिया को मजबूत करेगी और पुलिस विवेचना में पारदर्शिता बढ़ाएगी। हालांकि इससे आम नागरिकों के लिए प्रक्रिया थोड़ी लंबी और तकनीकी भी हो सकती है।

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