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बरेली सपा में ‘तीसरा फॉर्मूला’ तैयार, जिलाध्यक्ष पर मंथन तेज

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बरेली। मिशन 2027 को साधने के लिए समाजवादी पार्टी जिले में संगठनात्मक पुनर्गठन की दिशा में निर्णायक कदम उठाने की तैयारी में है। आपसी कलह और कमजोर पड़ते संगठनात्मक ढांचे के बीच पार्टी हाईकमान अब पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर ‘तीसरे फॉर्मूले’ पर मंथन कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस बार जिलाध्यक्ष की कुर्सी ऐसे चेहरे को दी जा सकती है जो जातीय संतुलन साधने के साथ भाजपा के वोट बैंक में भी सेंध लगा सके।

जिलाध्यक्ष पद पर सर्वमान्य चेहरे की तलाश

हाल ही में जिलाध्यक्ष और पूरी जिला कार्यकारिणी को भंग कर पार्टी नेतृत्व ने संकेत दे दिया था कि अब संगठन में प्रदर्शन और स्वीकार्यता को प्राथमिकता मिलेगी। अंदरूनी खींचतान, टिकट वितरण में पक्षपात और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव ने संगठन को कमजोर किया है। इसका असर बूथ स्तर की सक्रियता और जनहित मुद्दों पर पार्टी की उपस्थिति पर भी पड़ा।

पार्टी अब ऐसे सर्वमान्य नेता की तलाश में है, जो संगठन को एकजुट कर सके। दावेदारों की सूची लंबी है, लेकिन जो नेता विधानसभा टिकट की भी दावेदारी जता रहे हैं, उनकी संभावनाएं स्वतः कम होती दिख रही हैं।

मिशन 2027 और जातीय गणित

पिछले विधानसभा चुनाव में जिले की नौ सीटों में से सपा को केवल दो पर सफलता मिली, जबकि सात सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। ऐसे में पार्टी इस बार जातीय समीकरण को नए सिरे से साधने की रणनीति पर काम कर रही है। चर्चा है कि पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के अंतर्गत किसी पिछड़े या गैर-परंपरागत वर्ग से जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है।

जिले में पहले से दो मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें से एक को महासचिव की जिम्मेदारी भी दी जा चुकी है। शहर अध्यक्ष पद भी मुस्लिम समुदाय के पास है। ऐसे में मुस्लिम चेहरे को जिलाध्यक्ष बनाए जाने की संभावना कम मानी जा रही है।

दावेदारों के नाम और आंतरिक समीकरण

यादव वर्ग से पूर्व जिलाध्यक्ष एवं प्रदेश सचिव शुमलेश यादव और पूर्व जिला महासचिव योगेश यादव के नाम चर्चा में हैं। वहीं कुर्मी समाज से मनोहर सिंह पटेल और नरोत्तम सिंह पटेल, तथा पाल समाज से राजकुमार पाल का नाम भी सियासी गलियारों में लिया जा रहा है।

वरिष्ठ नेता वीरपाल सिंह यादव का संगठन में प्रभाव माना जाता है, क्योंकि उन्होंने दिवंगत मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर रुहेलखंड क्षेत्र में पार्टी को मजबूत करने में भूमिका निभाई थी। उनकी राय भी चयन प्रक्रिया में अहम मानी जा रही है।

भाजपा के वोट बैंक पर नजर

रणनीति का दूसरा पहलू भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाना है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक प्रतिनिधित्व का सही संयोजन बैठाया गया तो 2027 में बेहतर प्रदर्शन संभव है।

हाल में पीलीभीत के पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूलबाबू के पार्टी में शामिल होने से भी क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव की चर्चा तेज हुई है। माना जा रहा है कि ऐसे नेताओं के सुझावों को भी महत्व दिया जाएगा।

घोषणा कब?

सूत्रों के अनुसार, यदि सप्ताह भर में नाम की घोषणा नहीं हुई तो होली के बाद ही नए जिलाध्यक्ष की ताजपोशी संभव है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के विधानसभा सत्र में व्यस्त होने के कारण अंतिम निर्णय में कुछ समय लग सकता है।

फिलहाल बरेली की राजनीति में ‘तीसरे फॉर्मूले’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं। अब देखना यह है कि सपा किस चेहरे पर दांव लगाती है और क्या यह रणनीति 2027 के चुनावी रण में पार्टी को नई ऊर्जा दे पाएगी।

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