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AI के बढ़ते इस्तेमाल का पर्यावरण पर असर: बिजली और पानी की खपत

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आज के डिजिटल युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के सवालों का हल बन चुके हैं। बस कुछ शब्द टाइप करें और मिनटों में जवाब प्राप्त हो जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया जितनी आसान दिखती है, इसके पीछे बड़े-बड़े डेटा सेंटर काम करते हैं, जो भारी मात्रा में बिजली और पानी का उपयोग करते हैं।

AI प्रॉम्प्ट्स और ऊर्जा खपत

हाल ही में OpenAI ने जानकारी दी कि उसके AI सिस्टम को रोज लगभग 2.5 अरब प्रॉम्प्ट्स मिलते हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर प्रॉम्प्ट में औसतन 0.34 वॉट-घंटा बिजली खर्च होती है। इसे एक उदाहरण से समझें: यह उतनी ऊर्जा है जितनी एक साधारण LED बल्ब को करीब दो मिनट जलाने में लगती है।

पर्यावरण पर प्रभाव

AI सिस्टम की इतनी भारी खपत का अर्थ है कि बिजली और पानी के संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। बड़े डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए अत्यधिक पानी का इस्तेमाल होता है और बिजली की मांग भी लगातार बढ़ती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सस्टेनेबल AI और ऊर्जा कुशल मॉडल्स पर काम करना अब समय की मांग बन चुका है।

भविष्य की दिशा

AI का इस्तेमाल बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए तकनीकी कंपनियों को पर्यावरणीय असर को कम करने के लिए ग्रीन डेटा सेंटर, ऊर्जा-कुशल हार्डवेयर, और नवीनतम एल्गोरिदम का सहारा लेना होगा। साथ ही, आम उपयोगकर्ताओं को भी AI टूल्स के इस्तेमाल में जिम्मेदारी अपनानी होगी।

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