कांग्रेस का गिरता ग्राफ: 14 राज्यों की सत्ता से सिमटकर 3 तक, क्या संभव है वापसी?

नई दिल्ली/लखनऊ: भारतीय राजनीति में Indian National Congress का इतिहास कभी सत्ता के शीर्ष पर रहा है, लेकिन मौजूदा दौर में पार्टी अपने सबसे चुनौतीपूर्ण चरण से गुजर रही है। एक समय केंद्र और राज्यों में मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस अब सीमित राजनीतिक प्रभाव के साथ संघर्ष करती नजर आ रही है। पिछले तीन दशकों का आंकलन इस गिरावट की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।
लोकसभा में गिरता प्रदर्शन
1990 के दशक में कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति की धुरी मानी जाती थी। 1991 के आम चुनाव में पार्टी ने 232 सीटें हासिल कर मजबूत स्थिति बनाई थी। हालांकि, इसके बाद गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ—
1996 में 140 सीटें, 1999 में 114 सीटें।
2004 और 2009 के बीच पार्टी ने वापसी की झलक जरूर दिखाई, जब सीटें 145 से बढ़कर 206 तक पहुंचीं। लेकिन 2014 में यह आंकड़ा ऐतिहासिक रूप से घटकर 44 सीटों पर आ गया। 2019 में 52 सीटें मिलीं, जबकि 2024 में पार्टी को गठबंधन के सहारे कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन स्वतंत्र रूप से स्थिति अब भी कमजोर बनी हुई है।
उत्तर प्रदेश में कमजोर होती पकड़
देश की राजनीति का अहम केंद्र माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन और भी गिरता हुआ दिखाई देता है।
1991 में पार्टी ने 46 सीटें (करीब 18% वोट) हासिल की थीं, लेकिन समय के साथ यह आधार खिसकता गया।
2002 में 25 सीटें, 2012 में 28 सीटों के साथ हल्का सुधार जरूर दिखा, लेकिन 2017 में गठबंधन के बावजूद पार्टी 7 सीटों तक सिमट गई। 2022 विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा घटकर महज 2 सीटों और लगभग 2.3% वोट शेयर तक पहुंच गया।
लोकसभा में यूपी से घटता प्रभाव
लोकसभा चुनावों में भी उत्तर प्रदेश से कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती गई।
1991 में करीब 15 सीटों के साथ मजबूत उपस्थिति रही, जबकि 2009 में 21 सीटों के साथ आखिरी बड़ा उछाल देखा गया।
इसके बाद 2014 में पार्टी सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई और 2019 में यह संख्या घटकर 1 रह गई। 2024 में गठबंधन के सहारे कुछ सुधार हुआ, लेकिन स्वतंत्र जनाधार अभी भी सीमित है।
राज्यों में सत्ता का सिमटता दायरा
एक समय कांग्रेस लगभग 14 राज्यों में सरकार चला रही थी। वर्तमान में पार्टी का स्वतंत्र प्रभाव सीमित होकर कुछ राज्यों तक रह गया है, जिनमें प्रमुख रूप से कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं। अन्य राज्यों में पार्टी या तो गठबंधन पर निर्भर है या विपक्ष की भूमिका निभा रही है।
गिरावट के प्रमुख कारण
विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस की इस गिरावट के पीछे कई संरचनात्मक और रणनीतिक कारण हैं—
- संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी
- जमीनी स्तर पर प्रभावी नेतृत्व का अभाव
- क्षेत्रीय दलों का उभार
- चुनावी रणनीति में निरंतर असफलता
- युवा और नए मतदाताओं से दूरी
क्या वापसी संभव है?
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन को पुनर्गठित करने की भी है। पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत ढांचा तैयार करना होगा, नए नेतृत्व को अवसर देना होगा और जन मुद्दों से सीधा जुड़ाव बढ़ाना होगा।






